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Sunday, 6 April 2014

एक लम्हे की मुहब्बत - शाम

मैं ऑफिस से निकल
मिलने जा रही थी जाने किससे
वो सामने ट्रेन के सेकंड क्लास डब्बे में बैठा
माथे पर ढेर सारी शिकनें सजाए
जाने क्या सोच रहा था

धूप में जली रंगत, बालों में हलकी सी चांदी 
हाथ में ब्राउन बेल्ट वाली घड़ी
शिकन-आलूद नीली शर्ट
और गले में लटकती टाई
कुछ भी तो अलग नहीं था उसमे
मुम्बई की बेपनाह भीड़ का एक बेनाम हिस्सा

फिर उसने नज़रें उठायी
वहम था शायद मेरा
पर एक पल के लिए
कुछ कहा उसने आँखों में मेरे 
क्या कुछ नहीं था उस लम्हे में
बारिश, रातें, दुआ, इबादत
सुकून, लुत्फ़, उम्मीद, अश्क़...

मुहब्बत तो नहीं मगर
एक नज़्म उभरी है सीने में आज...

Monday, 17 March 2014

एक लम्हे की मुहब्बत - शायान

मैं ढीली टाई और शिकन-आलूद* शर्ट में
लोकल ट्रेन के दुसरे दर्जे में बैठा
मुम्बई की भागती-दौड़ती भीड़ से जूझता
सांसें लेने की कोशिश कर रहा था...

तुम शायद ऑफिस से निकल
मिलने जा रही थी किसी से
थके चेहरे पे खूब पानी के छीटों से
जगाना चाहा था हिसों* को अपनी
कानो में सस्ते से इअर-रिंग डाल रखे थे
शायद ट्रेन में ही लिया होगा कभी

कुछ ऐसा नहीं था
की मैं देखता मुड़ कर दुबारा
ट्रेन धक्के खाती हुई
अभी निकलने को ही थी स्टेशन से
की तुम किसी बात पर मुस्कुरायी

एक पल के लिए मदहम पड़ गयी मुम्बई की रफ़्तार भी
दूसरे लम्हे, स्टेशन वो छूट गया पीछे कहीं

एक लम्हे की मुहब्बत थी वो
लम्हे भर में गुज़र गयी
हाँ, लजज़त उसकी रहेगी कुछ दिनों तक होंटों पर
कुछ दिनों तक मुस्कुराऊंगा मैं...


*शिकन-आलूद - wrinkled, crumpled
*हिस - senses