Friday, 25 March 2016

November

~आख़िरी बारिश और पहली बर्फ़ के दरमियां का बेमज़ा मौसम

तुम्हारी ज़िन्दगी में मेरा किरदार 'नवंबर' की तरह था~

Saturday, 12 March 2016

Happy Women's Day!

कुल आठ बरस की थी मैं
जब पापा के प्यार से 'बेटा' बुलाने पर
तुमने किस क़दर नाराज़गी से कहा था
नहीं. बेटी ही है.
और 
कल जब
पड़ोस की आंटी ने,
मेरे प्रमोशन की ख़बर सुन कर कहा -
मुबारक हो, नाम रौशन किया है
ये आपकी बेटी नहीं, बेटा है
तुमने बड़े ही फ़ख़्र से कहा
नहीं. बेटी ही है.

उस दिन
पूछ ही लिया तुमसे
माँ
सब तो कहते हैं
लड़के लड़की में कोई फर्क नहीं होता
तुम क्यों नहीं मानती?
क्यों ज़िद है कि फ़र्क़ होता है


तुम मुस्कुराई
क्यूँकि फ़र्क़ तो है !
तुम्हे आगे, बहुत आगे जाना था ,
ज़माने की हदों को लांघ कर,
नयी रवायतें बनानी थी .
नामुमकिन ख्वाब देखने थे,
उन्हें सच कर दिखाना था .
तुम्हे उड़ना था आसमान में ,
तुम्हारे पैरों में बेड़ियां क्यों डालती?
बेटा समझती तो बेटा ही रह जाती,
बेटी कभी नहीं बन पाती.

The Proposal

सुनो,
पहली मुहब्बत दोनों को रास नहीं आई है
तुम पर भी दरारें हैं, मैं भी टूटा टूटा सा 
तुम्हारे अश्क़ थमते नहीं, मैं मुस्कुराना भूल गया 
तुम्हारा दिल टूट चुका है पहले
मैं हमेशा से ज़रा clumsy हूँ
इश्क़ से हारी तुम भी हो,
इश्क़ का मारा मैं भी हूँ

तुम ख़ाली हाथ, मैं तन्हाइयों का आदी
खोने को दोनों के पास अब कुछ नहीं बाक़ी
क्यों न मुहब्बत का फलसफा ज़रा बदल के देखें
पहली मुहब्बत को दूसरी बार करके देखें!

First Love is often overrated

सुनो
पहली मुहब्बत अक्सर ओवर-रेटेड होती है
कुछ रस्म दुनिया की ऐसी है
कुछ फिल्मों ने भी आदत बिगाड़ी है
वरना
तुम ही सोचो

फुर्सत किसे घंटो फ़ोन पर बातें करने की
रातों को जागने की अब उम्र भी तो नहीं रही
तुम्हारे नख़रे उठाने का दिल तो बहुत चाहता है
मगर कौन अब साहिल पर घरौंदे बनाता है
चाँद से बातें करूँ कैसे, बड़ा बुनियादी सा मसला है
मेरी खिड़की से सिर्फ पडोसी का बल्ब नज़र आता है
बारिशों में साथ भीगना, कैसी ये हिमाक़त है
मैं अक्सर छींकता रहता हूँ, मेरे बॉस को शिकायत है

इसलिए बेहतर है जानां
तुम आख़िरी मुहब्बत का इंतज़ार करो
जब हक़ीक़त अफसानों से ज़्यादा पसंद आए
और तुम्हारे ख्वाबों पर ज़रा सी उम्र आ जाए
जब ज़िन्दगी जीने के लिए किसी और की ज़रूरत न रहे
और मुहब्बत का सबब सिर्फ मुहब्बत न रहे

क्यूँकि पहली मुहब्बत अक्सर ओवर-रेटेड होती है!

Thursday, 10 December 2015

Freedom - An Illusion

मैं आज़ाद हूँ.
गुनाहों से, अज़ाबों से, अंधेरों से.
मेरी गली की बिजली नहीं जाती, मेरी सड़क पर जुर्म नहीं होते,
मैं मुत्मईं हूँ, महफूज़ हूँ, मसरूफ हूँ,
मैं आज़ाद हूँ.

जो रात घर न लौट सकी, वो मेरी बेटी नहीं थी,
धर्म के नाम पर जो घर फूँक दिए, वो मेरा घर नहीं था,
सड़कों पर भूखे, नंगे, भीख मांगते बच्चे मेरे नहीं हैं,
वो जो जल कर मर गयी, वो मेरी पत्नी नहीं थी,
मेरे माँ-बाप दर-ब-दर ठोकरें नहीं खाते,
जिसकी इज़्ज़त बेबस सी सिसक रही थी दरवाज़े पर, वो मेरी बहन नहीं थी,
सरहद पर कल जो शहीद हो गया, वो मैं नहीं हूँ.

मेरी चार-दीवारी के आगे की दुनिया से,
मुल्क, इंसानियत, मुस्तक़बिल से,
सब बेवजह की फ़िक्रों से,
मैं आज़ाद हूँ.

The Idea of an Ideal Love

तेरे चेहरे पर देखना है गुज़रे हुए साल,
तजुर्बे* का रंग बालों में उतरते देखना है.
कांपते हाथों का सहारा देना है तुझे,
उम्र को आँखों में उभरते देखना है.
हमारे साथ के ग़म भी मुझे अज़ीज़* हैं यूँ,
बचकाना* बातों पर खुद को झगड़ते देखना है.
तेरे अश्कों को चुनना है लबों से अपने,
दामन में तेरे, खुद को बिखरते देखना है.

मुहबत की हसीं सहर* ठहरती कहाँ हैं?
मुझे वफ़ा की ज़ईफ़* शामें देखनी हैं.
ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव* पर, जानां,
अपने पहलू* में तुझे देखना है.

*तजुर्बे - experience
*अज़ीज़ - dear to me
*बचकाना - silly
*हसीं सहर - beautiful dawn
*ज़ईफ़ - old / mature /aged
*आखिरी पड़ाव - last stage
*पहलू - by my side

The Lost Identity

होंटों पर दुआ नहीं रहती, रंग रहते हैं,
ज़ुबां पर मुनाफ़िक़त* का ज़ायका*.
आँखें हैं कि ख़ाली वीरान हवेलियां;
बरसों से कोई आया नहीं हो जैसे.
सिगरेट की बू बस गयी है वजूद में;
धुआं जाने क्यों छंटता ही नहीं.
हथेली की लकीरें सूख कर गिरने लगी हैं,
वक़्त के पहले मौत आ रही है इन्हे.
सांसें महंगे परफ्यूम जैसी लगती हैं;
गैर-ज़रूरी* सी ज़रुरत,
जिसका असर उतरने लगा है अब
पेशानी* की सिलवटें* कम होती हैं,
ना लबों की मुस्कराहट.

आईना रोज़ पूछता है शिनाख्त* मेरी,
रोज़ मैं तुम्हारा चेहरा ओढ़ लेती हूँ.

*मुनफ़िक़त - hypocrisy
*ज़ायका - taste
*ग़ैर-ज़रूरी - unimportant
*पेशानी - forehead
*सिलवटें - wrinkles
*शिनाख्त - identity